संजय कपूर की विवादित वसीयत पर सवालों की बौछार, हाईकोर्ट में खुलीं कई कड़ियाँ

दिवंगत उद्योगपति संजय कपूर की कथित वसीयत को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में चल रही कानूनी लड़ाई ने अब नया मोड़ ले लिया है। कोर्ट में बहस के दौरान कई ऐसे गंभीर सवाल उठाए गए हैं, जिनसे वसीयत की विश्वसनीयता पर बड़ा संदेह खड़ा हो गया है।
करिश्मा कपूर के बच्चों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने कोर्ट के समक्ष बताया कि यह वसीयत क़ानून की बुनियादी कसौटियों पर खरी नहीं उतरती और इसे “संजय कपूर की अंतिम इच्छा” मानने का कोई ठोस आधार मौजूद नहीं है।
‘डिजिटल घोस्ट’ – वसीयत और संजय कपूर का कोई रिकॉर्ड नहीं
जेठमलानी ने संजय कपूर को इस वसीयत के संदर्भ में एक “डिजिटल घोस्ट” करार दिया।
उनका कहना था कि—
- संजय कपूर का ऐसा कोई ई-मेल, संदेश या निर्देश उपलब्ध नहीं है, जिससे साबित हो कि उन्होंने खुद वसीयत बनवाई या उसकी स्वीकृति दी।
- वसीयत से जुड़े किसी भी डिजिटल संवाद में संजय कपूर की सीधी भागीदारी नहीं दिखती।
- जिन व्हाट्सऐप चैट्स का हवाला प्रतिवादी पक्ष दे रहा है, वे भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 63 के तहत प्रमाणित ही नहीं की गईं।
- इसलिए इन चैट्स को कानूनी सबूत के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
मोबाइल फोन गायब – सबसे बड़ा सबूत कोर्ट से दूर
सबसे अहम बात यह सामने आई कि—
संजय कपूर का मोबाइल फोन, जो कथित डिजिटल सबूतों को सत्यापित कर सकता था, आज तक कोर्ट में जमा नहीं किया गया।
इसी मोबाइल से यह जानना संभव था कि वसीयत से जुड़े संदेश वास्तव में भेजे गए या नहीं — लेकिन फोन पूरी तरह “लापता” है।
रहस्यमयी समय – अचानक क्यों बनी वसीयत?
वसीयत मार्च 2025 की बताई जा रही है, उस समय—
- संजय कपूर पूरी तरह स्वस्थ थे,
- उनका व्यवसाय सक्रिय रूप से चल रहा था,
- आर्थिक स्थिति मज़बूत थी,
- पहले से उनके बच्चों के लिए ट्रस्ट व्यवस्था मौजूद थी।
फिर अचानक ऐसी वसीयत बनाने की क्या जरूरत पड़ गई —
इसका कोई भी भरोसेमंद कारण या दस्तावेज कोर्ट को नहीं दिखाया गया।
गवाहों की गवाही में बड़ी कानूनी कमी
वसीयत के वैध होने के लिए अनिवार्य है कि—
- दोनों गवाहों ने एक-दूसरे की मौजूदगी में संजय कपूर को हस्ताक्षर करते देखा हो।
लेकिन:
- किसी भी गवाह ने अपने शपथपत्र में न यह बताया कि हस्ताक्षर कब हुए
- न यह बताया कि दोनों गवाह एक साथ मौजूद थे।
यह कानून की सीधी अवहेलना है और वसीयत की वैधता पर करारा प्रहार करता है।
गुरुग्राम या कहीं और? — हस्ताक्षर की जगह स्पष्ट नहीं
वसीयत में लिखा है कि दस्तावेज़ गुरुग्राम में निष्पादित हुआ,
लेकिन:
- किसी भी गवाह ने इस स्थान की पुष्टि नहीं की।
- ना समय बताया गया, ना सटीक जगह।
ऐसी विरोधाभासी बातें अदालत की नजर में वसीयत को
“संदिग्ध परिस्थितियों” में डाल देती हैं।
ओरिजिनल वसीयत की कड़ी टूटी
कोर्ट में यह भी सामने आया कि—
- संजय कपूर की मृत्यु के तुरंत बाद वसीयत किसके पास थी — इसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं।
- वह कहाँ रखी गई, किसने संभाली और कैसे पेश हुई — इनकी कोई स्पष्ट कड़ी मौजूद नहीं।
इससे दस्तावेज़ में छेड़छाड़ या बाद में बनाए जाने की आशंका गहराती है।
बेन-1 फॉर्म से खुला बड़ा विरोधाभास
6 अगस्त 2025 को दाखिल Ben-1 फॉर्म में
प्रिय सच्चदेवा कपूर ने खुद लिखा कि:
उन्हें AIPL में संजय कपूर की 6.5% हिस्सेदारी में
कोई लाभकारी अधिकार नहीं है।
जबकि उनकी अपनी दलील यह है कि—
- यह हिस्सेदारी उन्हें वसीयत द्वारा पहले ही मिल चुकी थी।
यह सीधा विरोधाभास साबित करता है कि:
संभव है कि वसीयत बाद में तैयार की गई हो, ताकि परिस्थितियों को अपने पक्ष में दिखाया जा सके।
बच्चों को 2,500 करोड़? — सिर्फ कागज़ी दावा
प्रतिवादी पक्ष का दावा है कि बच्चों को—
- ₹2,500 करोड़ की हिस्सेदारी ट्रस्ट से मिली,
- जबकि प्रिय कपूर को ₹7,500 करोड़ मूल्य की संपत्ति दी गई।
लेकिन सच यह है:
- बच्चों को एक भी रुपया वास्तविक रूप से प्राप्त नहीं हुआ
- यह आकलन केवल कागज़ी और काल्पनिक मूल्यांकन है।
बच्चों की देखभाल ‘उदारता’ नहीं, कोर्ट का आदेश
यह दिखाने की कोशिश की गई कि—
- बच्चों की पढ़ाई और खर्च दिए जा रहे हैं — यह पिता की “उदारता” है।
जबकि हकीकत:
- ये भुगतान सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत अनिवार्य जिम्मेदारी थे।
- इसे वसीयत को जायज ठहराने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
नाबालिग बच्चों का अस्पष्टीकृत बहिष्कार
कानून साफ कहता है—
यदि किसी वसीयत में नाबालिग प्राकृतिक वारिसों को बिना वजह बाहर किया जाए,
तो कोर्ट को कठोर और गहन जांच करनी चाहिए।
यहाँ—
- संजय कपूर ने अपने बच्चों को प्राथमिकता से वंचित किया।
- इसके पीछे कोई लिखित कारण, ई-मेल या नोट नहीं दिखाया गया।
निष्कर्ष
दिल्ली हाईकोर्ट में हुई सुनवाई से यह साफ होता जा रहा है कि:
- वसीयत से संजय कपूर का कोई ठोस डिजिटल संबंध नहीं
- गवाहों की गवाही अधूरी और अवैध है
- समय व स्थान विरोधाभासी हैं
- ओरिजिनल दस्तावेज़ की कस्टडी संदिग्ध है
- डिजिटल सबूत अधूरे व अप्रमाणित हैं
महेश जेठमलानी ने अदालत में इन दस्तावेज़ों को
“मूर्खतापूर्ण मनगढ़ंत प्रयास” बताते हुए कहा कि प्रतिवादी पक्ष ने
“फर्जी डिजिटल साक्ष्यों से एक बनावटी वसीयत को वैध साबित करने की कोशिश की है।”
अब देखना यह है कि अदालत इन तमाम संदेहों को कितनी गंभीरता से लेते हुए
संजय कपूर की कथित वसीयत पर अंतिम फैसला सुनाती है।
नवीनतम अपडेट और रोमांचक कहानियों के लिए हमें ट्विटर, गूगल न्यूज और इंस्टाग्राम पर फॉलो करें और फेसबुक पर हमें लाइक करें।








