कोलकाता की ‘अभया’ कांड: निर्भया के बाद भी नहीं थमा महिलाओं पर अत्याचार

12 साल पहले हुए दिल्ली के निर्भया कांड ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इसके बाद ऐसा माना जा रहा था कि इस विभत्स घटना के बाद देश में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में कमी आएगी। कानून बदले, सरकारें बदलीं, लेकिन महिलाओं के खिलाफ हो रहे जघन्य अपराधों पर लगाम नहीं लग पाई। अब एक और दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जो देश की राजधानी दिल्ली में नहीं, बल्कि कोलकाता में घटित हुई है। इस बार निर्भया की जगह कोलकाता की बहादुर बेटी ‘अभया’ है।
कानून कड़े, लेकिन सोच वही पुरानी
कोलकाता के आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज में एक जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या की घटना ने एक बार फिर समाज को हिला कर रख दिया है। निर्भया कांड के बाद सरकार ने बलात्कार के खिलाफ कानून कड़े किए थे, लेकिन इसके बावजूद अपराधियों के मन में ऐसे जघन्य अपराध करने से पहले कोई डर नहीं है। देश में इस तरह की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं।
काउंसिल इंडिया की काउंसिलिंग साइकोलॉजिस्ट और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ निशि का मानना है कि कानून बनाना अपनी जगह है, लेकिन समाज की सोच में बदलाव लाना उससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि हमारे समाज में महिलाओं को अभी भी हेय दृष्टि से देखा जाता है, और यही सोच ऐसी घटनाओं की जड़ है।
अपराध के बढ़ते आंकड़े
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि साल 2012 में महिलाओं के खिलाफ 2,44,270 अपराध दर्ज किए गए थे, जिनमें 24,923 बलात्कार के मामले थे। हालांकि, घटना के एक दशक बाद भी अपराध कम होने के बजाय बढ़े हैं। एनसीआरबी के ताजा आंकड़ों के अनुसार, साल 2022 में महिलाओं के खिलाफ 4,45,256 अपराध दर्ज किए गए, जिनमें 31,516 बलात्कार के मामले शामिल थे। ये आंकड़े समाज की सोच और महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव की अत्यंत आवश्यकता को दर्शाते हैं।
सम्मान की सीख बचपन से
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ निशि का कहना है कि महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना बचपन से ही बच्चों में विकसित की जानी चाहिए। उन्होंने बताया कि परिवार और समाज का इसमें अहम योगदान होता है। अगर कोई बच्चा अपनी बहन या महिला मित्र को मारता है, और उसे उसी समय रोका जाए और सही व्यवहार सिखाया जाए, तो उसके मन में एक डर और सम्मान पैदा होगा।
उन्होंने कहा कि मेल डोमिनेंट सोसायटी में बच्चा घर में ही देखता है कि परिवार के सदस्य मां के साथ सही व्यवहार नहीं कर रहे। ऐसे वातावरण का असर बच्चे के मानसिक विकास पर पड़ता है, जिससे उसकी सोच गलत दिशा में जा सकती है।
फिल्मों का असर
फिल्मों का समाज पर गहरा असर होता है। निशि ने उदाहरण देते हुए कहा कि हाल की फिल्मों जैसे कबीर सिंह और एनीमल में महिलाओं के प्रति सम्मान की कमी दिखाई गई है। इन फिल्मों में महिलाओं पर हिंसा को सामान्य दिखाया गया, जो मानसिक विकास को प्रभावित करता है। बॉलीवुड का समाज की सोच पर बड़ा असर होता है और यह फिल्मों में महिलाओं के प्रति दिखाए गए व्यवहार से भी स्पष्ट है।
मित्रता के रूप में मार्गदर्शन की जरूरत
निशि ने यह भी कहा कि बचपन के बाद, विशेष रूप से किशोरावस्था में दोस्तों का प्रभाव बहुत महत्वपूर्ण होता है। मां-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों से दोस्ताना तरीके से बात करें और उन्हें समझने की कोशिश करें। यह बेहतर होता है कि वे अभिभावक के रूप में नहीं, बल्कि एक दोस्त की तरह उनसे संवाद करें।
सेक्स एजुकेशन का महत्व
निशि ने स्कूलों में सेक्स एजुकेशन की वकालत की ताकि लड़के और लड़कियां शारीरिक अंतर के बावजूद एक-दूसरे को समान मान-सम्मान दें। उन्होंने कहा कि स्कूलों में सेक्स एजुकेशन को पढ़ाया जाना चाहिए ताकि यह समझा जा सके कि लड़का और लड़की में सिर्फ शारीरिक बनावट का अंतर है। इस विषय पर समाज में बने टैबू को खत्म करना जरूरी है ताकि बच्चों में सही सोच का विकास हो सके।
अभया के अपराधियों को सजा देने की मांग
निशि ने कोलकाता की ‘अभया’ के अपराधियों को जल्द और कड़ी सजा देने की भी आवश्यकता पर जोर दिया। उनका मानना है कि इस तरह के जघन्य अपराधों के लिए सख्त सजा अपराधियों के मन में डर पैदा कर सकती है और भविष्य में ऐसे अपराधों को रोकने में मददगार हो सकती है।
मीडिया की भूमिका
मीडिया की भूमिका पर निशि ने कहा कि इस तरह की घटनाओं को मीडिया में प्रमुखता से उठाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मीडिया का एक असरदार प्रभाव होता है, और जब किसी अपराध को सार्वजनिक रूप से सामने लाया जाता है, तो अपराधियों के मन में एक भय उत्पन्न हो सकता है। इससे अपराध करने वालों के मन में डर पैदा हो सकता है, जो ऐसे अपराधों को रोकने में सहायक हो सकता है।
निष्कर्ष
कोलकाता की ‘अभया’ कांड ने एक बार फिर से समाज के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या कड़े कानून ही पर्याप्त हैं, या समाज की सोच में बदलाव की भी आवश्यकता है? विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना नहीं विकसित होती, तब तक इस तरह की घटनाएं रुकना मुश्किल है। अब समय आ गया है कि देश अपने बेटियों को न सिर्फ सुरक्षा, बल्कि सम्मान भी दे।
Source IANS
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